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गैर-सरकारी संस्थाओं की भूमिका

मध्याह्न-भोजन कार्यक्रम के निष्पादन एवं विस्तार में गैर-सरकारी संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। राज्य सरकार के निकाय अपनी पहुंच में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्याह्न-भोजन कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु Akshaya Patra फ़ाउंडेशन जैसी गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ गठबन्धन करती हैं। इस प्रकार, कई गैर-सरकारी संस्थाएं भूख और कुपोषण का सामना करने की दिशा में कार्य करती हैं।

यह निजी-सार्वजनिक साझेदारी (पीपीपी) कार्यक्रम की गुणवत्ता और उसकी पहुंच को बेहतर बनाने में बेहद सहायक सिद्ध हुई है। साझेदारी हेतु गैर-लाभप्रद संगठन का चयन करते समय सरकार कई पक्षों पर विचार करती है। ऐसे संगठनों को पारदर्शी तथा ‘प्रमाणित सत्यनिष्ठा वाला’ अवश्य ही होना चाहिए। गैर-सरकारी संस्था के चयन के लिए एनपी-एनएसपीई 2004 मानदंड इस प्रकार हैं :

गैर-सरकारी संस्था के चयन के लिए एनपी-एनएसपीई 2004 मानदंड:
  • स्वयंसेवी एजेंसियों को धर्म, जाति एवं सम्प्रदाय के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए और उन्हें कार्यक्रम का उपयोग किसी भी धार्मिक प्रथा के प्रचार-प्रसार के लिए नहीं करना चाहिए।

  • स्वयंसेवी एजेंसी को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम अथवा सार्वजनिक न्यास अधिनियम के तहत पंजीकृत निकाय होना चाहिए और उसे कम-से-कम दो वर्षों से अस्तित्व में होना चाहिए।

  • गैर-लाभप्रद आधार पर उत्तरदायित्व निर्वहन का उपक्रम करने की प्रतिबद्धता।

  • राज्य सरकारों के सम्बन्धित दिशानिर्देशों के अनुसार पीआरआई/नागरिक निकायों (नगरपालिका/नगरनिगम) के साथ कार्य करने के लिए सम्मति।

  • राज्य सरकारों के सम्बन्धित दिशानिर्देशों के अनुसार पीआरआई/नागरिक निकायों (नगरपालिका/नगरनिगम) के साथ कार्य करने के लिए सम्मति।

  • अपेक्षित स्तर पर मध्याह्न भोजन आपूर्त करने के लिए वित्तीय एवं सुप्रचालनिक (लॉजिस्टिक) क्षमता।

  • वह सरकार से नकद एवं वस्तु-रूप में प्राप्त सभी अनुदानों के सम्बन्ध में अनुमोदित चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा विधिवत् प्रमाणिक वार्षिक रिपोर्ट एवं ऑडिट किया हुआ अकाउंट विवरण, उसे कार्य समनुदेशित करने वाले निकाय को प्रस्तुत करेगी।

खाद्यान्न अनुदान से लेकर पके हुए भोजन तक

चयनित कर लिए जाने पर, गैर-सरकारी संस्था को रसोई की व्यवस्था करनी होगी, भोजन तैयार करने के अपने दिन-प्रतिदिन के कार्य संचालित करने होंगे और संचालन लागतों का प्रबन्ध करना होगा। एनपी-एनएसपीई 2004 दिशानिर्देशों के अनुसार...

‘ऐसे शहरी क्षेत्रों, जहाँ कई विद्यालयों के समूह के लिए केन्द्रीयकृत रसोई व्यवस्था सम्भव हो, में जहाँ भी उपयुक्त हो, भोजन पकाने का उपक्रम केन्द्रीयकृत रसोईयों में किया जा सकता है और पके हुए गर्म भोजन को फिर एक विश्वसनीय परिवहन प्रणाली द्वारा विभिन्न विद्यालयों तक स्वच्छ स्थिति में पहुंचाया जा सकता है। जिन समूहों को सेवा दी जा रही है उनकी संख्या के आधार पर किसी शहरी क्षेत्र में ऐसी एकाधिक नोडल रसोई(याँ) हो सकती हैं।

अतः कार्यक्रम को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के लिए गैर-सरकारी संस्था को कार्यक्रम के सुप्रचलान (लॉजिस्टिक्स) को सम्भालने के लिए सुसज्जित अवश्य होना चाहिए। गैर-लाभप्रद संस्था के पास अपेक्षित स्तर पर मध्याह्न-भोजन आपूर्त करने की वित्तीय एवं सुप्रचलानिक (लॉजिस्टिक) क्षमता अवश्य होनी चाहिए।’

इसे कैसे  प्राप्त किया जा सकता है इस विषय में सरकार एक समाधान प्रदान करती है। मानव संसाधन विकास मन्त्रालय का कथन है कि :

 “राज्य सरकार पात्र विद्यालयों में पकाए गए अथवा पहले से पके हुए में से किसी भी एक भोजन प्रकारान्तर के लिए गैर-सरकारी संस्था के माध्यम से कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु पूर्णतः उत्तरदायी होगी। इस सीमा तक, राज्य सरकार अथवा सम्बन्धित गैर-सरकारी संस्था खाद्यान्नों के पके हुए भोजन में रूप रूपान्तरण हेतु संसाधन एकत्रित कर सकती है।”     

      -   दिशानिर्देश, संलग्नक नवम्, पैरा 7

इस समाधान के कारण Akshaya Patra जैसे संगठन, जिनकी रसोईयाँ देशभर में हैं, औसतन रु. 80 मिलियन (8 करोड़) की लागत पर, अपनी विशाल अवसंरचनाएं स्थापित करने एवं सरकारी दिशानिर्देशों के अनुरूप योजना संचालित करने में समर्थ हो पाए हैं। इससे कार्यक्रम क्रियान्वयन के दौरान उपगत हुए घाटे हेतु गैर-सरकारी संस्था को धन एकत्रित करने का एक जरिया मिल जाता है।

जैसा कि वर्ष 2008-2009 की कार्यक्रम अनुमोदन बोर्ड बैठक के कार्यवृत्त में वर्णित है, “अन्य व्यय, जैसे कि रसोईयों के मानदेय, पात्र एवं रसोई निर्माण, परिवहन का वहन गैर-सरकारी संस्थाओं को करना होगा।”

  सरकार ने प्राप्त दानों के लिए भी प्रावधान बनाए हैं। उदाहरण के लिए, 2003 में भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक समिति (राष्ट्रीय सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण संवर्धन समिति, राजस्व विभाग, वित्त मन्त्रालय, भारत सरकार) ने Akshaya Patra की अनुशंसा एक ऐसी पात्र परियोजना के रूप में की जो 3 वर्षों तक 100% कर लाभ के साथ दानकर्ताओं से रु. 220 मिलियन (22 करोड़) तक के दान प्राप्त कर सकती है।

2006 में समिति ने एक बार फिर से Akshaya Patra के कार्यक्रम की समीक्षा की और कर-मुक्त दानों की राशि को बढ़ाकर रु. 1,000 मिलियन (100 करोड़) कर दिया। 2009 की एक और समीक्षा के बाद इस राशि को 3 वर्षों की अवधि के लिए  बढ़ाकर रु. 2,000 मिलियन (200 करोड़) कर दिया गया।    

संगठनों के न्यास विलेख, जो सरकार के संज्ञान में होते हैं, उन्हें धन एकत्रित करने में सक्षम बनाते हैं। Akshaya Patra के न्यास विलेख में निम्नांकित वर्णित है :           

8.xi विश्वभर से व्यक्तियों, कॉर्पोरेट एवं गैर-लाभप्रद संगठनों से उपहार, दान अथवा योगदान प्राप्त करने के लिए, बशर्ते कि वे न्यास के उद्देश्यों से असंगत न हों           

गैर-सरकारी संस्थाओँ को बढ़ावा देने के सरकारी निर्णय के लिए यह एक दोतरफ़ा लाभ वाली कार्यनीति है। ऐसा करने से न केवल कार्यक्रम की गुणवत्ता में सुधार आता है बल्कि इससे सामुदायिक संलग्नता को भी बढ़ावा मिलता है। एनपी-एनएसपीई दिशानिर्देश, 2004 के अनुसार, ‘जीवंत सामुदायिक संलग्नता सुनिश्चित करने के लिए भी प्रक्रियाएं कार्यरत की जानी चाहिए ताकि मध्याह्न-भोजन कार्यक्रम लोगों का कार्यक्रम बन जाए।’

गैर-सरकारी संस्थाएं सक्रिय स्वयंसेवा एवं धन-एकत्रीकरण के जरिए से सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देती हैं। वे समाज के सभी स्तरों को संलग्न करती हैं और मध्याह्न-भोजन योजना को ‘लोगों का’ कार्यक्रम बनाने में सरकार की मदद करती हैं।

कार्यक्रम को पारदर्शी बनाए रखना

यहाँ सार्वजनिक-निजी साझेदारी में किए जा रहे प्रचालनों की पारदर्शिता का प्रश्न उठता है। राष्ट्र स्तर की एक दिशा-नियन्त्रक-सह-निरीक्षण समिति (एनएसएमसी) कार्यक्रम के प्रबन्धन एवं निरीक्षण पर नज़र रखती है। जैसा कि एनपी-एनएसपीई, 2004 में वर्णित है, समिति के दायित्वों में शामिल हैं :

  •     कार्यक्रम के लिए सामुदायिक सहयोग जुटाना और सार्वजनिक-निजी साझेदारी को बढ़ावा देना।’

  •     कार्यक्रम क्रियान्वयन का निरीक्षण करना, उसके प्रभाव का आकलन करना और सुधारात्मक कदम उठाना।

पात्रता की शर्तों में से एक शर्त यह है कि, ‘संगठन या संस्थान के मामलों का प्रबन्धन करने वाले व्यक्ति प्रमाणित सत्यनिष्ठा वाले हों’ (राष्ट्रीय सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण संवर्धन समिति, भारत सरकार)। एक अन्य शर्त यह है कि, ‘संगठन अथवा संस्थान अपनी पावतियों एवं व्यय के नियमित खाते अनुरक्षित करे’। स्वयंसेवी संगठन द्वारा नियमित रूप से रिपोर्टें प्रस्तुत अवश्य की जानी चाहिए।

परिणाम

मध्याह्न-भोजन योजना के क्रियान्वयन में कई निजी निकायों की संलग्नता से स्पष्ट तौर पर बेहतर प्रदर्शन प्राप्त हुआ है।

  • योजना के तहत लगभग 120 मिलियन (12 करोड़) बच्चे अब तक कवर किए जा चुके हैं जिसने इसे दुनिया का सबसे बड़ा विद्यालयी भोजन कार्यक्रम बना दिया है। इस प्रकार, सरकार के बहु-पक्षीय दृष्टिकोण ने जबर्दस्त परिणाम दर्शाए हैं।

  • सरकार की क्रियान्वयन भुजा के रूप में Akshaya Patra जैसे संगठनों को नियुक्त कर उनके अनूठे संसाधनों का लाभ उठाने के द्वारा एवं उन्हें यथा-सम्भव रूप से आत्म-निर्भर बनाने हेतु उनके लिए प्रावधान करने के द्वारा सरकार ने हमारे देश के  बच्चों की सहायता के लिए पूरे समाज को सफलतापूर्वक संलग्न कर लिया है। ये फ़ाउंडेशन धन-एकत्रीकरण एवं स्वयंसेवा के जरिए सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देते हैं।

  • इससे जिन निजी-सार्वजनिक साझेदारियों को प्रोत्साहन मिला है वे कार्यक्रम की सफलता सुनिश्चित करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध हुई हैं। इन संगठनों के सहयोग से, सरकार योजना के आकार को अति-बृहद स्तर पर ले जाने में सफल रही है।

  • योजना ने बच्चों पर कई तरीकों से असर डाला है। उपस्थितियाँ बढ़ गई हैं, पढ़ाई के दौरान भूखे रहने की स्थिति में कमी आई है, कुपोषण घटा है और सभी जातियों के बच्चों के बीच घुलने-मिलने को बढ़ावा मिला है।

  • वैश्विक स्तर पर, भारत सरकार  ने सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम किया है।

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